क्राइम केवल वही गंभीर नहीं होता जिसे किताबों में लिखा गया है, कुछ घटनाओं में ब्लड तो नहीं बहता लेकिन वे कई दिनों की नींद हराम कर सकती हैं। हमें लगता है आज भी गांवों, छोटे बाजारों और नगरों में सुप्रीम कोर्ट में हुए जैसे अपराध/अराजकता, कभी न कभी ऐसे बौद्धिक मानव मन को झेलने ही पड़ते हैं जो संख्याबल में कम और स्वभाव से कमजोर होते हैं। दुख की बात यह है कि पुलिस भी ऐसी घटनाओं को गंभीरता से नहीं लेती, न ही ऐसी घटनाओं को झेला हुआ बौद्धिक इंसान, शब्दों के द्वारा पेपर पर लिख सकता है। क्योंकि जितना बोझिल यह कुकृत्य होता है उतने भारी शब्द किसी भी भाषा में हैं ही नहीं जिन्हें आसानी से व्यक्त किया जा सके। जब पढ़े लिखे लोग अपनी आपबीती नहीं बता सकते तो अतिसाधारण लोगों की दशा होती होगी? हर व्यक्ति सुप्रीम कोर्ट का माननीय चीफ जस्टिस नहीं होता है, जिसकी क्षमता ऐसी घटिया हरकत झेल सके। इसलिए ऐसी घटनाओं से आला उच्च सदन समेत हर पालिका को समझना चाहिए कि देश में अराजकता का स्तर क्या है? और इससे कैसे निपटना है? (सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश पर जूते मारने के लिए किए गए प्रयास के घटना के संदर्भ में)