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शब्दों में नहीं समाने वाला अपराध

क्राइम केवल वही गंभीर नहीं होता जिसे किताबों में लिखा गया है, कुछ घटनाओं में ब्लड तो नहीं बहता लेकिन वे कई दिनों की नींद हराम कर सकती हैं। हमें लगता है आज भी गांवों, छोटे बाजारों और नगरों में सुप्रीम कोर्ट में हुए जैसे अपराध/अराजकता, कभी न कभी ऐसे बौद्धिक मानव मन को झेलने ही पड़ते हैं जो संख्याबल में कम और स्वभाव से कमजोर होते हैं। दुख की बात यह है कि पुलिस भी ऐसी घटनाओं को गंभीरता से नहीं लेती, न ही ऐसी घटनाओं को झेला हुआ बौद्धिक इंसान, शब्दों के द्वारा पेपर पर लिख सकता है। क्योंकि जितना बोझिल यह कुकृत्य होता है उतने भारी शब्द किसी भी भाषा में हैं ही नहीं जिन्हें आसानी से व्यक्त किया जा सके। जब पढ़े लिखे लोग अपनी आपबीती नहीं बता सकते तो अतिसाधारण लोगों की दशा होती होगी?  हर व्यक्ति सुप्रीम कोर्ट का माननीय चीफ जस्टिस नहीं होता है, जिसकी क्षमता ऐसी घटिया हरकत झेल सके। इसलिए ऐसी घटनाओं से आला उच्च सदन समेत हर पालिका को समझना चाहिए कि देश में अराजकता का स्तर क्या है? और इससे कैसे निपटना है? (सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश पर जूते मारने के लिए किए गए प्रयास के घटना के संदर्भ में)

बेसिक शिक्षा में सुधार हेतु मेरे द्वारा दिए गए सुझाव

1. ग्रामीण क्षेत्र में कार्यरत शिक्षकों को विशेष प्रोत्साहन भत्ता या अधिक HRA दिया जाए, जबकि शहरी क्षेत्र में HRA कम रखा जाए। इस व्यवस्था से शिक्षक गाँव में रहने के लिए उत्साहित होंगे और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी बल मिलेगा। 2. गाँव में कार्यरत शिक्षकों को मुफ्त आवासीय सुविधा प्रदान की जाए। 3. शिक्षकों का ट्रांसफर प्रायारिटी के आधार पर उनके मनचाहा स्थान पर देने की कोशिश हो। और ट्रांसफर व्यवस्था लॉक ना हो यह हर साल होनी चाहिए। 4. शिक्षकों के बच्चों को सरकारी विद्यालयों में मुफ्त शिक्षा की गारंटी दी जाए। 5. स्कूलों की गुणवत्ता और सुविधा में सुधार हेतु प्रत्येक विद्यालय को अत्याधुनिक तकनीक से सुसज्जित क्लासरूम, पुस्तकालय और अन्य संसाधनों से लैस किया जाए। 6. सरकारी विद्यालयों के बच्चों के ड्रेस कोड निर्धारण की जिम्मेदारी स्कूल प्रशासन और प्रबंधन को सौंपी जाए, जिससे स्थानीय आवश्यकताओं के अनुसार निर्णय लिया जा सके। 7. प्रत्येक विद्यालय में सफाईकर्मी की उपस्थिति विद्यालय समय में अनिवार्य हो तथा एक क्लर्क स्तर का संविदा कर्मचारी नियुक्त किया जाए, जिससे शिक्षक प्रशासनिक कार्यों से मुक्त होकर शि...

सीतापुर बेल्ट कांड: अफसरशाही बनाम शिक्षक

किसी विद्वान ने कहा है कि प्रलय और सृजन, दोनों ही शिक्षक की गोद में पलते हैं। इस सत्य को नदवा, सीतापुर के मासूम बच्चों ने अपने संघर्ष से जीवंत कर दिया। सोचिए! चार दिन का आंदोलन! स्कूल की तालाबंदी, कक्षाओं का बहिष्कार, मध्यान्ह भोजन का त्याग, चिलचिलाती धूप में बैठे-बैठे बेहोश हो जाना… और इसके बावजूद केवल एक ही मांग “हमारे बड़े सर की वापसी।” ये बच्चे दिल्ली विश्वविद्यालय, जेएनयू या इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्र नहीं थे, जो भोजन, जूते-चप्पल या किताब-कॉपी की गुणवत्ता के लिए आंदोलन कर रहे हों। ये तो कक्षा 1, 2 और 3 के मासूम थे, जो केवल अपने शिक्षक के लिए सड़कों पर उतर आए। क्या यह दृश्य प्रशासन और समाज की आत्मा को झकझोरने के लिए काफी नहीं? जिस स्कूल में बड़े वाले सर ने अकेले ही बच्चों को पढ़ाया, आज वहाँ पाँच-पाँच शिक्षक तैनात कर दिए गए। पुलिस, एसडीएम, डीएम, विधायक तक उस स्कूल के बच्चों की क्लास लेने उतर गए। बच्चों को टॉफियाँ बाँटी गईं, समझाया गया, बहलाया गया। लेकिन किसी से भी अपने बड़े वाले सर के विरुद्ध एक शब्द बुलवाया न जा सका। यह कैसा युग है, जहाँ पंचायत चुनावों में वोट बिक जाते हैं, पर...

सोशल मीडिया स्टेटस

अच्छा है अब लोग नहीं उनके प्रोफ़ाइल है अच्छा है लोगों के नोक झोंक झिक झीक नहीं स्टेटस ही बहुत कुछ कह जाता है अच्छा है मशविरा सुनने से फुरसत मैसेज से बात हो जाती है प्रोफ़ाइल, स्टेटस पोस्ट बहुत कुछ कह जाते है अब बात करने की क्या जरूरत है

असफलता का दर्शन शास्त्र

असफलता आखिर किसके जीवन का हिस्सा नहीं रहा है लेकिन लोगों ने इससे उबर कर हर बार एक नहीं कहानी गढ़े हैं। लेकिन आखिर कब तक संभावना रहेगी कि असफलता संघर्ष का एक हिस्सा रहेगी? मेरे खयाल से असफलता में तभी तक एक नई जीवन देने की क्षमता होती है जब तक आशा बनी रहती है। एक हिसाब से उसी काल खंड को हो संघर्ष कहा जहां असफलता के बाद भी आशा बलवती होती है। यानी आशा विहीन असफलता को संघर्ष नहीं कहेंगे। आशा विहीन असफलता केवल जीवन का बोझिल हिस्सा होता है।

शिक्षक की ग्रेच्युटी पर रोक: ग्रेच्युटी का असल मकसद

शिक्षक की भूमिका केवल पढ़ाने तक सीमित नहीं होती। वह बच्चे का गुरु ही नहीं, उसके चतुर्दिक विकास का शिल्पी होता है। जिस जिम्मेदारी को माता-पिता तक पूरी तरह नहीं निभा पाते, वही जिम्मेदारी एक शिक्षक अपने कंधों पर उठाता है। अपनी पूरी जवानी वह दूसरों के बच्चों को संवारने में खपा देता है। अपने बच्चों से भी बढ़कर वह समाज के बच्चों को मार्गदर्शन देता है, उन्हें पढ़ाता है, उनका भविष्य बनाता है। फिर सेवानिवृत्ति के समय सरकार द्वारा धन्यवाद राशि के रूप में ग्रेच्युटी देने का प्रावधान कोई एहसान नहीं, बल्कि न्यूनतम कर्तव्य है। लेकिन विडंबना देखिए! ऐसे विषय पर निर्णय वही लोग ले रहे हैं जिन्हें शिक्षक की तनख्वाह तक खटकती है।  ऐसी स्थिति में बीएसए का रवैया ही नहीं, बल्कि न्यायालय का निर्णय भी प्रश्नवाचक है। नियम यह कहता है 60 साल तक के सेवा पर ग्रेच्युटी का लाभ मिला परंतु शिक्षा सत्र का लाभ के कारण कुछ महीने अधिक सेवा के कारण ग्रेच्युटी के लाभ से BSA ने रोक लगा दी। और कोर्ट ने भी राहत नहीं दी। परंतु ग्रेच्युटी कोई लाभ नहीं है बल्कि लंबी सेवा के बदले का इनाम है इसलिए इसे ज्यादा और कम समय तक काम करने...