शिक्षक की भूमिका केवल पढ़ाने तक सीमित नहीं होती। वह बच्चे का गुरु ही नहीं, उसके चतुर्दिक विकास का शिल्पी होता है। जिस जिम्मेदारी को माता-पिता तक पूरी तरह नहीं निभा पाते, वही जिम्मेदारी एक शिक्षक अपने कंधों पर उठाता है।
अपनी पूरी जवानी वह दूसरों के बच्चों को संवारने में खपा देता है। अपने बच्चों से भी बढ़कर वह समाज के बच्चों को मार्गदर्शन देता है, उन्हें पढ़ाता है, उनका भविष्य बनाता है। फिर सेवानिवृत्ति के समय सरकार द्वारा धन्यवाद राशि के रूप में ग्रेच्युटी देने का प्रावधान कोई एहसान नहीं, बल्कि न्यूनतम कर्तव्य है।
लेकिन विडंबना देखिए! ऐसे विषय पर निर्णय वही लोग ले रहे हैं जिन्हें शिक्षक की तनख्वाह तक खटकती है। ऐसी स्थिति में बीएसए का रवैया ही नहीं, बल्कि न्यायालय का निर्णय भी प्रश्नवाचक है।
नियम यह कहता है 60 साल तक के सेवा पर ग्रेच्युटी का लाभ मिला परंतु शिक्षा सत्र का लाभ के कारण कुछ महीने अधिक सेवा के कारण ग्रेच्युटी के लाभ से BSA ने रोक लगा दी। और कोर्ट ने भी राहत नहीं दी। परंतु ग्रेच्युटी कोई लाभ नहीं है बल्कि लंबी सेवा के बदले का इनाम है इसलिए इसे ज्यादा और कम समय तक काम करने के बीच रखना क्या ठीक है?
क्या यह न्याय है कि जिसने अपने जीवन का सर्वस्व समाज को समर्पित कर दिया, उसे बुढ़ापे में एक धन्यवाद राशि से भी वंचित कर दिया जाए? क्या शिक्षक का त्याग केवल आंकड़ों और नियमों में तौला जाएगा?
यह केवल ग्रेच्युटी का प्रश्न नहीं है। यह शिक्षक के सम्मान का प्रश्न है। और यदि शिक्षक का सम्मान ही छिन जाए, तो आने वाली पीढ़ियों का भविष्य भी अंधकारमय हो जाएगा।
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डा अखिलेश मोदनवाल
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