किसी विद्वान ने कहा है कि प्रलय और सृजन, दोनों ही शिक्षक की गोद में पलते हैं। इस सत्य को नदवा, सीतापुर के मासूम बच्चों ने अपने संघर्ष से जीवंत कर दिया।
सोचिए! चार दिन का आंदोलन! स्कूल की तालाबंदी, कक्षाओं का बहिष्कार, मध्यान्ह भोजन का त्याग, चिलचिलाती धूप में बैठे-बैठे बेहोश हो जाना… और इसके बावजूद केवल एक ही मांग “हमारे बड़े सर की वापसी।”
ये बच्चे दिल्ली विश्वविद्यालय, जेएनयू या इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्र नहीं थे, जो भोजन, जूते-चप्पल या किताब-कॉपी की गुणवत्ता के लिए आंदोलन कर रहे हों। ये तो कक्षा 1, 2 और 3 के मासूम थे, जो केवल अपने शिक्षक के लिए सड़कों पर उतर आए। क्या यह दृश्य प्रशासन और समाज की आत्मा को झकझोरने के लिए काफी नहीं?
जिस स्कूल में बड़े वाले सर ने अकेले ही बच्चों को पढ़ाया, आज वहाँ पाँच-पाँच शिक्षक तैनात कर दिए गए। पुलिस, एसडीएम, डीएम, विधायक तक उस स्कूल के बच्चों की क्लास लेने उतर गए। बच्चों को टॉफियाँ बाँटी गईं, समझाया गया, बहलाया गया। लेकिन किसी से भी अपने बड़े वाले सर के विरुद्ध एक शब्द बुलवाया न जा सका।
यह कैसा युग है, जहाँ पंचायत चुनावों में वोट बिक जाते हैं, पर नन्हें बच्चे नंगे पैरों की छालों की परवाह किए बिना, भूख-प्यास की परवाह किए बिना अपने गुरु के लिए अडिग खड़े रहे? क्या यह अद्वितीय उदाहरण नौकरशाही की आत्मा को नहीं झकझोरता?
यही तो असली गुरुदक्षिणा है, न केवल उस शिक्षक के लिए, बल्कि पूरे शिक्षक समाज के लिए। यह कहानी हर शिक्षक को गौरवान्वित करती है कि शिक्षक पैसा नहीं इज्जत कमाता है। और यह घटना नौकरशाह को चेतावनी देती है कि शिक्षक का अपमान, केवल एक व्यक्ति का अपमान नहीं है, यह पूरे समाज का पतन है।
फिर भी सवाल उठता है कि जिसका आभूषण धैर्य और दया है, वह शिक्षक आखिर क्यों BSA पर टूट पड़ा? कौन-सा ज़हर रोज़ पिलाया जाता होगा, जिसने उसकी सहनशीलता को चकनाचूर कर दिया? क्या यह सिर्फ़ एक क्षणिक ग़ुस्सा था, या उस अपमान का विस्फोट, जिसे हर दिन शिक्षक झेलता है?
हम हिंसा का समर्थन नहीं कर सकते। लेकिन क्या यह ग़लत सवाल है कि हर स्तर पर चाहे विश्वविद्यालय में रजिस्ट्रार या माध्यमिक में डीआईओएस और प्राथमिक में बीएसए तक आखिर क्यों शिक्षकों को कमतर भांपते है? क्यों शिक्षक की वाणी को हमेशा दबाया जाता है?
सीतापुर बेल्ट कांड एक आईना है। यह बताता है कि अब शिक्षक की सहनशीलता को कमजोरी समझा जाने लगा है। भले ही शिक्षक ने भगत सिंह जैसा रास्ता चुन लिया, पर क्या यह सच नहीं कि इस सिस्टम का असली चेहरा उजागर करने का और कोई मार्ग ही नहीं छोड़ा गया था?
याद रखिए! आज का अपमानित शिक्षक कल की टूटी हुई परंपरा है। और जब गुरु का सम्मान मिटेगा, तब समाज का भविष्य भी अंधकार में ही डूब जाएगा।
सादर 🙏
डा अखिलेश मोदनवाल
असिस्टेंट प्रोफेसर, रसायन विज्ञान
पी बी पी जी कॉलेज प्रतापगढ़
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